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रक्षाबंधन पर ननद को मिलेगी हॅसिया की विदाई

जारी के ग्रामीण इलाके में हंसिया बनाते सुरेश विश्वकर्मा।

गोविंद शरण

जारी (प्रयागराज)। देशभर में रक्षाबंधन की तैयारियां और बधाइयां जोरों पर हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी नेताओं ने भारतीयों को रक्षाबंधन पर्व की बधाई दी है। मिठाइयों और रक्षा सूत्र की खरीदारी को शहर से लेकर कस्बों की बाजार में ग्राहकों की भीड़ दिखी लेकिन प्रयागराज के यमुनापार इलाके में रक्षाबंधन पर एक अनोखी परंपरा की तैयारी दिखी।

पाठा छेत्र में रक्षाबंधन त्योहार मनाने की एक अनोखी परंपरा है। इसमें भाभियां अपने घर आई ननद को राखी बांधने के बाद पति के साथ ससुराल वापसी के दौरान हंसिया की विदाई देती हैं। यह हंसिया ग्रामीण इलाके में फसल और घास काटने के काम में आती है। यही नहीं, ग्रामीण महिलाओं के लिए यह आत्मरक्षा का एक प्राचीन औजार भी है, जिसे महिलाएं हमेशा अपने कमर में रखती हैं। महिलाएं खेतों में काम करने जाती हैं तो भी उनके हाथ में हसिया दिखती है।

ऐसी तमाम कहानियां हैं, जिसमें आत्मरक्षा के लिए महिलाओं ने अपनी हंसीआ का इस्तेमाल किया है। रामसखी, दुलारी, शिवपत्ती, अनारकली पुरबहीया जैसी कई महिलाओं ने अपनी बचपन की यादों से बताया कि कई बार ऐसा हुआ जब हमारे ऊपर किसी पुरुष ने गलत निगाह डाली तो हमने अपनी हंसिया से बचाव किया।

महिलाओं के अनुसार हंसिया का इस्तेमाल जंगली जानवरों और जहरीले जंतुओं से भी अपनी रक्षा के लिए करती हैं। हंसिया ही एक ऐसा औजार है जिसे महिलाएं खेती के काम में आत्मरक्षा के लिए प्रयोग करती हैं। पाठा और बुंदेलखंड ही नहीं, गांवों में घर-घर कोने में हंसिया मिल जाएगी। शहरी कल्चर में ढल चुके परिवारों और किसानी का मोह त्याग चुके परिवारों की छोड़ दें तोज्यादातर श्रमिक और किसान परिवारों में हंसिया का आज भी चलन है।

इस बार रक्षाबंधन पर गांव के लोहारों के यहां रक्षाबंधन के पहले ही भीड़ लगी है। जारी गांव के सुरेश विश्वकर्म जो थोड़ा ऊंचा सुनते हैं और सड़क किनारे जामुन के पेड़ के नीचे लोहारी का काम करते हैं, उनके यहां नई हंसिया बनवाने के लिए भीड़ लगी है। महिलाएं अपने ननदों को देने के लिए हंसिया बनवाने में पिछले कई दिनों में जुटी हैं। इस समय एक हंसिया बनवाई 40 से 50 रुपये है। पक्के लोहे और रेती की हंसिया का दाम ₹70 है।

आत्मरक्षा के लिए या अपने साथी की ही सुरक्षा के लिए फसल काटने वाली हंसीया अभी भी भारत के कई हिस्सों में पर्सनल हथियार के रूप में महिलाओं द्वारा उपयोग में आती है। जिसका कोई भी लाइसेंस नहीं बनाया जाता। वह इस्तेमाल की जा रही है लेकिन इसकी चर्चा और सराहना कहीं नहीं है। जबकि रक्षाबंधन के दिन हम नकली उपहारों मिठाइयों और चाइना की बनी परदेस से आई राखियां बांधने में लगे हैं। ग्रामीण इलाकों की ऐसी परंपराओं का संरक्षण करने की जरूरत है, जिससे वह महिलाओं के लिए हथियार और पेट भरने का साधन बना रहे।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)