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परिसीमन में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की 26 सीटों का क्या होगा?

फारुख अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद। (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर इन दिनों व्यापक बदलाव के दौर से गुज़र रहा है। ये बदलाव मुख्य रूप से राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर होते दिख रहे हैं। पाँच अगस्त 2019 को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म कर दिया था, तब से ही बदलाव का यह दौर जारी है। जम्मू-कश्मीर दो केंद्र शासित प्रदेश में बँट गया है. लद्दाख पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेश है लेकिन जम्मू-कश्मीर में विधानसभा रहेगी।

विशेष दर्जा ख़त्म होने के बाद से वहाँ नई व्यवस्था में अब तक चुनाव नहीं हो पाया है। केंद्र की मोदी सरकार वहाँ चुनाव परिसीमन के बाद कराना चाहती है और परिसीमन के लिए चुनाव आयोग की टीम राज्य के विभिन्न इलाक़ों में जायज़ा लेकर लौटी है।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, परिसीमन आयोग अंतिम रिपोर्ट 2011 की जनगणना और भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर तैयार करेगा। इसमें मुश्किल भौगोलिक स्थिति, संचार के साधन और बुनियादी सुविधाओं का भी ध्यान रखा जाएगा। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए भी सीटें सुरक्षित रहेंगी।

क्या होगा बदलाव?

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होने से पहले वहां की विधानसभा में 87 सदस्य चुने जाते थे. 83 जम्मू-कश्मीर से और 4 लद्दाख से. लद्दाख के अलग यूटी बनने के बाद 83 सीटें बची हैं लेकिन परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर 90 हो जाएगी.

यानी सात सीटें बढ़नी हैं. इन सीटों को बढ़ाने के लिए जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति, बुनियादी सुविधाएं और संपर्क के साधनों को आधार बनाया गया है. कहा जा रहा है कि इन आधार का सीधा फ़ायदा जम्मू संभाग को मिलेगा।

जम्मू-कश्मीर के ज़्यादातर मुख्यमंत्री कश्मीर के ही रहे हैं। ग़ुलाम नबी आज़ाद पहले शख़्स थे जो जम्मू के थे और मुख्यमंत्री बने थे। कश्मीर में विधानसभा सीटें ज़्यादा हैं। इसलिए भी वहाँ के लोग ज़्यादा मुख्यमंत्री बने। कश्मीर की आबादी में मुसलमान बहुसंख्यक हैं और जम्मू की आबादी मिश्रित है लेकिन हिन्दू ज़्यादा हैं। ये कहा जा रहा है कि जम्मू में सीटें कश्मीर से ज़्यादा होंगी तो कोई हिन्दू भी मुख्यमंत्री बन सकता है। जम्मू-कश्मीर में अब तक कोई हिन्दू मुख्यमंत्री नहीं बना है।

परिसीमन आयोग के तीन सदस्यों का पैनल जम्मू-कश्मीर में चार दिन परामर्श करने के बाद शुक्रवार को लौटा है। इस पैनल के लौटने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा कि परिसीमन कोई गणितीय प्रक्रिया नहीं है।

उन्होंने कहा, ”परिसीमन में संबंधित भौगोलिक क्षेत्र की राजनीतिक महत्वाकांक्षा को जगह मिलनी चाहिए। हालांकि जनसंख्या एक आधार होती है लेकिन हमने मुश्किल भौगोलिक स्थिति और बुनियादी सुविधाओं का भी ध्यान रखा है। इससे पहले परिसीमन में लोगों की मुश्किलें और कठिन भौगोलिक स्थिति का ध्यान नहीं रखा जाता था।”

मुख्य चुनाव आयुक्त ने क्या कहा?

चंद्रा ने कहा कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लिए सुरक्षित 24 सीटें इस परिसीमन प्रक्रिया में शामिल नहीं हैं। भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में 24 सीटें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के लिए छोड़ी गई हैं।

भारत का मानना है कि जब पूरे कश्मीर पर उसका नियंत्रण होगा तो वहाँ के लोगों की नुमाइंदगी के लिए ये सीटें होंगी। विधानसभा में 24 कुर्सियाँ ख़ाली रहती हैं। इन्हीं सीटों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि ये परिसीमन का हिस्सा नहीं हैं।

सुशील चंद्रा ने कहा, ”परिसीमन आयोग अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सुरक्षित सीटों को भी रेखांकित करेगा। जम्मू-कश्मीर में यह पहली बार होगा कि अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटें सुरक्षित होंगी।”

अभी जम्मू-कश्मीर में सात सीटें अनुसूचित जातियों के लिए सुरक्षित हैं। ये आरक्षण मुख्य रूप से जम्मू के कठुआ-सांबा इलाक़े में है। यह पहली बार होगा कि परिसीमन की प्रक्रिया में यहाँ की जनजातियों के लिए सीटें सुरक्षित होंगी।

इनमें गुज्जर और बकरवाल भी शामिल होंगे। गुज्जरों और बकरवालों की ज़्यादातर आबादी पीर पांजाल घाटी और जम्मू के पुंछ के साथ राजौरी ज़िले में है। सुशील चंद्रा ने कहा है कि परिसीमन आयोग ने जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग समूहों से बात की है।

सुशील चंद्रा ने कहा, ”पहले ड्राफ़्ट रिपोर्ट तैयार की जाएगी। ड्राफ़्ट रिपोर्ट पर लोगों की राय ली जाएगी। इसके बाद लोगों की सहमति के लिए इसे सार्वजनिक किया जाएगा। इसके़ बाद अंतिम रिपोर्ट तैयार होगी. लोगों को अपनी राय और सलाह देने का मौक़ा दिया जाएगा।”

महबूबा मुफ़्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने कहा है कि परिसीमन पैनल का फ़ैसला सुनियोजित है।

इस टिप्पणी पर मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा, ”अगर ऐसा होता तो हम इस लेकर व्यापक पैमाने पर परामर्श नहीं करते। हमने प्रदेश के हर इलाक़े में जाकर स्थिति को समझने की कोशिश की है. सभी ने हमारी पहल का स्वागत किया है।”

सुशील चंदा ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में 1995 में 1981 की जनगणना के आधार पर केवल 14 ज़िलों में परिसीमन हुआ था। उन्होंने कहा, ”अभी जम्मू-कश्मीर में 20 ज़िले हैं. कई विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं एक ज़िले से दूसरे ज़िले तक में चली गई हैं।”

परिसीमन आयोग के साथ बैठक में ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने जल्द से जल्द पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग की है।

परिसीमन आयोग से गुरुवार को जम्मू-कश्मीर बीजेपी यूनिट के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाक़ात की थी। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व जम्मू-कश्मीर बीजेपी अध्यक्ष रविंदर रैना ने किया। रैना ने जम्मू से विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व की मांग की।

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार रैना ने कहा, ”मैंने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर के शरणार्थियों के लिए सीटें सुरक्षित करने की मांग की। हमने कहा कि पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर की 24 में से आठ सीटों पर प्रतिनिधि चुने जाएं और वे सभी शरणार्थियों को मिले।”

रैना ने कहा, ”1995 का परिसीमन बंदरबाँट की तरह था. जम्मू-कश्मीर में हमेशा से शक्ति का असंतुलन रहा है। भारतीय संविधान के जो छह मुख्य बिंदु हैं उनके आधार पर परिसीमन किया जा रहा है। छह बिंदुओं में से छठा आधार आबादी है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की 24 सीटों में से एक तिहाई सीटों को डिफ्रीज़ किया जाए, क्योंकि 1947, 65 और 71 में पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर की एक तिहाई आबादी हमारे यहाँ आ गई थी। इसलिए उन्हें ये सीटें दी जाएं। हमने कश्मीर पंडितों के लिए तीन सीटें सुरक्षित करने के लिए मांग की है।”

साभार ः बीबीसी

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Ranvijay Singh

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