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महिला स्वास्थ्यः शरीर मेरा है, परंतु फैसला हमारा नहीं

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 57 विकासशील देशों की लगभग आधी महिलाओं को गर्भनिरोधक का उपयोग करने, स्वास्थ्य देखभाल की मांग करने या फिर अपनी कामुकता सहित अपने शरीर के बारे में निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।

यूएन जनसंख्या कोष ने इस रिपोर्ट के माध्यम से महिलाओं द्वारा अपने शरीर के बारे में ख़ुद के निर्णय लेने की उनकी क्षमता को मापा है। साथ ही यह जानने की कोशिश की है कि ये निर्णय लेने के लिये किसी महिला के अधिकारों को देश के क़ानून समर्थन देते हैं या नहीं।

जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक़ निर्णय लेने की शक्ति और शिक्षा के उच्च स्तर के बीच एक मज़बूत सम्बन्ध पाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार जिन देशों में आँकड़ें उपलब्ध हैं, वहाँ –

• केवल 55% महिलाएँ ही स्वास्थ्य देखभाल, गर्भनिरोधक और सैक्स के लिये हाँ या नहीं कहने के लिये पूरी तरह से सशक्त हैं।
• केवल 71% देश, समग्र मातृत्व देखभाल की उपलब्धता की गारण्टी देते हैं।
• केवल 75% देश क़ानूनी रूप से गर्भनिरोधक के लिये पूर्ण व समान पहुँच सुनिश्चित करते हैं।
• लगभग 80% देशों में यौन स्वास्थ्य और कल्याण का समर्थन करने वाले क़ानून हैं।
• केवल 56% देशों में व्यापक यौन शिक्षा का समर्थन करने वाले क़ानून और नीतियाँ हैं।

भारत में यूएन जनसंख्या कोष (UNFPA) की प्रतिनिधि और भूटान की देश निदेशिका, अर्जेंटीना मातावेल पिक्किन कहती हैं, “दुनिया भर में महिलाएँ अपने शरीर को लेकर फ़ैसले लेने के मूल अधिकार से वंचित हैं और कोविड-19 महामारी के कारण तालाबन्दी, रोज़गार ख़त्म होने और शिक्षा प्रणाली में व्यवधान उत्पन्न होने से यौन हिंसा, स्वास्थ्य देखभाल में बाधाओं, अनियंत्रित गर्भधारण के हालात को और ज़्यादा बदतर हो गए हैं।”

“यह समझते हुए कि 2030 तक वैश्विक स्तर पर गर्भनिरोधक की मांग, मातृ मृत्यु की रोकथाम, लिंग आधारित हिंसा और हानिकारक प्रथाओं को ख़त्म करने के, जनसंख्या कोष के, लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये, शारीरिक स्वायत्तता का अधिकार आवश्यक है… हम इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये पूर्णत: प्रतिबद्ध हैं।” 

भारत की स्थिति

भारत में, उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्तमान में 15 से 49 वर्ष की आयु वाली केवल 12 प्रतिशत विवाहित महिलाएँ स्वतन्त्र रूप से अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में निर्णय लेती हैं, जबकि 63 प्रतिशत महिलाएँ अपने जीवनसाथी से परामर्श के बाद ही निर्णय लेती हैं।

लगभग एक चौथाई महिलाओं (23%) के लिये, जीवनसाथी ही मुख्य रूप से स्वास्थ्य सेवाओं का निर्णय लेता है।

गर्भनिरोधक के उपयोग के बारे में निर्णय लेने की क्षमता के बारे में फ़िलहाल केवल 8 प्रतिशत विवाहित महिलाएँ (15-49 आयु वर्ग) इसका फ़ैसला स्वतन्त्र रूप से करती हैं, जबकि 83 प्रतिशत महिलाएँ अपने पति के साथ संयुक्त रूप से निर्णय लेती हैं।

लगभग 10 में से 1 महिलाओं के लिये पति ही गर्भनिरोधक के उपयोग को लेकर निर्णय लेता है।

इसके अलावा, महिलाओं को गर्भनिरोधक के बारे में दी गई जानकारी सीमित है। गर्भनिरोधक का उपयोग करने वाली केवल 47 प्रतिशत महिलाओं को इसके इस्तेमाल के दुष्प्रभावों के बारे में बताया गया और 54 प्रतिशत महिलाओं को अन्य गर्भ निरोधकों के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई गई।

वास्तविक समाधान

रिपोर्ट में बताया गया है कि वास्तविक समाधान के लिये प्रभावित लोगों की ज़रूरतों और अनुभवों को ध्यान में रखना चाहिये।

अर्जेंटीना मातावेल पिक्किन कहती हैं, “शारीरिक स्वायत्तता एक नींव है जिस पर अन्य सभी मानवाधिकार टिके हैं और अब सभी के लिये इस स्वायत्तता को पहचानने और महसूस करने का समय है। भारत के औरंगाबाद शहर में, कुछ महिलाएँ. आँकड़ों के अनुसार, बहुत बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है जो अपने शरीर, सैक्स व स्वास्थ्य के बारे में ख़ुद फ़ैसले नहीं ले सकतीं.(भारत के औरंगाबाद शहर में, कुछ महिलाएँ. आँकड़ों के अनुसार, बहुत बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की है जो अपने शरीर, सैक्स व स्वास्थ्य के बारे में ख़ुद फ़ैसले नहीं ले सकतीं। फोटो- यूएन)

यूएन जनसंख्या कोष, शारीरिक स्वायत्तता एवं यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और अधिकार पर नए अन्तरराष्ट्रीय एक्शन गठबन्धन के माध्यम से गर्भनिरोधक और व्यापक यौन शिक्षा तक पहुँच को बढ़ावा दे रहा है। 

साथ ही, ऐसे उपायों को भी बढ़ावा दे रहा है जो महिलाओं और किशोरों को स्वयं के शरीर के बारे में फ़ैसले लेने के लिये सशक्त बना सकें। 

अर्जेंटीना मातावेल पिक्किन का कहना है, “जब दुनिया के सबसे कमज़ोर लोग अपने शरीर, स्वास्थ्य और भविष्य के बारे में सूचित विकल्प बनाने में सक्षम होते हैं, तब ही हम सभी व्यक्तियों, परिवारों, समुदायों और राष्ट्रों की पूरी क्षमता का विकास कर पाएँगे।”

उन्होंने कहा, “अनेक महिलाओं और लड़कियों को शारीरिक स्वायत्तता से वंचित करना सामाजिक मानदण्डों और क़ानूनों में समाया हुआ है, जिससे उनको सैक्स, स्वास्थ्य और प्रजनन के बारे में अपने स्वयं के सूचित निर्णय लेना मुश्किल या असम्भव हो जाता है। हम में से हर कोई लैंगिक असमानता और भेदभाव के सभी रूपों को उखाड़ फेंकने और इसे बनाए रखने वाली सामाजिक व आर्थिक संरचनाओं को बदलने में मदद कर सकते हैं।”