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गीता क्या कायरता का संदेश देती है ?

प्रमोद शुक्ल

“मुंह में राम बगल में छूरी” इस जुमले से सावधान तो बहुत किया गया पर उनसे सावधान नहीं किया गया, जिनके मुंह पर अहिंसा और बगल में गीता थी। अहिंसा की बात वह ढोंगी गीता लेकर लगातार करता रहा और आप मूर्ख बनते रहे। आपको कभी नहीं बताया गया कि अहिंसा का नारा देकर गीता की आड़ में आपको कायर बनाया जा रहा है।

गीता क्या कायरता का संदेश देती है? गीता सिर्फ यह कहती है कि जब तक संभव हो हिंसा को टालो यथासंभव.. परंतु यदि बाध्यता हो जाए तो फिर सारे संकोच भुला दो.. बाध्यता हो जाने पर हिंसा ही एकमात्र धर्म रह जाता है। समाज, परिवार और निज धर्म की रक्षा के लिए हिंसा यदि जरूरी हो जाए और अन्य कोई भी रास्ता न बचे तो लड़ो।

आज भी ऐसे हालात बन गए हैं.. चीन बार-बार धमकी दे रहा है। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि वह परोक्ष रूप से पूरी मानव सभ्यता को धमका रहा है, डरा रहा है।

अहिंसा के पुजारी अब तक हिंदुस्तान की बहुत सारी जमीन चीन के लिए छोड़ चुके हैं। अहिंसा के रास्ते पर चल कर बचे हुए भारत में भी हम बहुत कुछ छोड़ते आए। विदेशी और विधर्मी आकर बसते गये। यहां तक कि कुछ राज्यों में उनका पूरा बहुमत हो गया। उनकी मर्जी चलती है केरल सहित कयी अन्य छोटे राज्यों में.. अब वह बंगाल में भी पूरी तरह से मनमानी करने पर आमादा हैं।

लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई भारत सरकार जब चीन जैसे विस्तारवादी देश से अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए सेना को मजबूती देना चाहती है तब पहले तो राफेल खरीदने पर तमाम तरह से हल्ला मचाया जाता है। लगातार राफेल विमान और हथियारों के सौदे रोकने की पूरी कोशिश की जाती है।

फिर महामारी के समय जब एक चुनी हुई सरकार महामारी से सर्वोत्तम तरीके से लड़ रही होती है। दुनिया भर में भारत की वाहवाही होती है कि तमाम विकसित और मेडिकल सुविधा संपन्न देशों की तुलना में उसने इस महामारी से बहुत ही बेहतर तरीके से लड़ाई लड़ी है, तब उसी सरकार पर तमाम तरह से दबाव बनाकर विदेशी वैक्सिंन के दलाल अपनी स्वदेशी वैक्सिंन को बदनाम करने की साजिश लगातार रचते रहते हैं। जब ये दलाल इसमें भी सफल नहीं हो पाते तब तरह-तरह की अफवाह फैलाकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश करते हैं। उसमें भी सफलता नहीं मिली तो टूलकिट के बहुत सारे औजार सरकार को यह बताने की कोशिश करते हैं कि तुम्हें महामारी के शिकार लोगों का कैसे इलाज करना है? कहां कितनी दवा और कितनी ऑक्सीजन की व्यवस्था करनी है? उसमें भी वह एक्सपोज हो जाते हैं, तब वह कहते हैं कि कैसे तुम्हें मृतको को मुआवजा देना है? इन लोगों को सरकार लगातार जवाब देती आई है परंतु इनकी समझ में यह नहीं आ रहा है कि भाई, भारत जैसे लोकतंत्र में जनता ने फैसले करने के लिए जिनको चुना है, फैसला करने का अधिकार उसे ही है। व्यवस्था चलाने का अधिकार उसे ही है और बजट बनाने का अधिकार भी उसे ही है। जनता के टैक्स को किस रूप में, किस तरह से कहां कब और कैसे खर्च किया जाए। लोकतंत्र में यह अधिकार जनता ने सरकार को सौंपा है। उसे अपने अधिकार के साथ न्याय करने दो। लोकतंत्र बजट बनाने का अधिकार अन्य किसी को नहीं देता है कि कितना टैक्स किससे कहां कब और कितना वसूला जाना है।

संविधान और नियम कानून के तहत सरकार ही तय करती है और फिर एक दूरगामी रणनीति बनाकर बजट को कहां पर किस तरह से पैसे खर्च करने है। यह निर्धारित करने का अधिकार चुनी हुई सरकार को ही होता है। परंतु, जनता से ठुकराए हुए कुछ लोग लगातार हल्ला मचाते हैं कि देखो वह नयी संसद का निर्माण क्यों करा रहा है ?? न्यायपालिका एक लाख का जुर्माना लगाते हुए एक तरह से उनको लताड़ लगाती है कि अपनी सीमाओं में रहो, अपनी औकात में रहो, तुमको यह तय करने का अधिकार नहीं है कि चुनी हुई सरकार क्या करे और क्या ना करे? पर बेशर्म लोग कहां मानने वाले हैं.. वह कहावत है न कि… …भूत, बातों से नहीं मानते।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ज्योतिषाचार्य हैं।)