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40 साल तक रिकॉर्ड अटूट रखने और आजाद भारत के पहले स्वर्ण विजेता मिल्खा रहेंगे याद

भारत के महान फर्राटा धावक मिल्खा सिंह का बीते शुक्रवार को निधन हो गया। पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित मिल्खा सिंह 91 वर्ष के थे। रात 11.30 पर उन्होंने आखिरी सांस ली। वह चंडीगढ़ के जीआईएमईआर के आईसीयू में भर्ती थे। चार बार के एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मिल्खा ने वर्ष 1958 के राष्ट्रमंडल खेलों में पीला तमगा हासिल किया था । उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हालांकि 1960 के रोम ओलंपिक में था, जिसमें वह 400 मीटर फाइनल में चौथे स्थान पर रहे थे। उन्होंने 1956 और 1964 ओलिंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। साल 1959 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा था।

जानकारी के लिए बता दें कि मिल्खा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में आजाद भारत का पहला गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। मिल्खा ने 1958 ब्रिटिश और राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर भारत को न सिर्फ विश्व एथलेटिक्स के मानचित्र पर पहचान दिलाई, बल्कि पूरे विश्व को इस बात का भरोसा दिलाया कि भारत सबको साथ लेकर चलता है।

पीएम ने जताया दुख, लिखा- हमने महान एथलीट खो दिया

महान ऐथलीट के निधन पर पीएम मोदी ने तस्वीर शेयर करते हुए शोक व्यक्त किया है। उन्होंने ट्वीट किया- मिल्खा सिंह जी के निधन से हमने एक महान खिलाड़ी खो दिया, जिसने देश की कल्पना पर कब्जा कर लिया और अनगिनत भारतीयों के दिलों में एक विशेष स्थान बना लिया। उनके प्रेरक व्यक्तित्व ने उन्हें लाखों लोगों का प्रिय बना दिया। उनके निधन से आहत हूं।

उन्होंने दूसरे ट्वीट में लिखा- अभी कुछ दिन पहले ही मेरी मिल्खा सिंह जी से बात हुई थी। मुझे नहीं पता था कि यह हमारी आखिरी बातचीत होगी। कई एथलीट उनकी जीवन यात्रा से ताकत हासिल करेंगे। उनके परिवार और दुनिया भर में कई प्रशंसकों के प्रति मेरी संवेदनाएं।

ओलंपिक में रहा शानदार सफर

वर्ष 1958 ओलंपिक मेें इतिहास रचने वाले मिल्खा सिंह ने दूसरी बार 1960 के ओलंपिक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी ये रेस काफी चर्चित रही। इस रेस में फ्लाइंग सिख कांस्य पदक से चूक गए। वे तब चौथे स्थान पर रहे, मगर उनका 45.73 सेकंड का ये रिकॉर्ड अगले 40 वर्षों तक नेशनल रिकॉर्ड रहा।

तीसरे स्थान पर रहकर दक्षिण अफ्रीका के मैल्कम स्पेंस ने कांस्य पदक जीता था। इस रेस में 250 मीटर तक मिल्खा पहले स्थान पर भाग रहे थे, लेकिन इसके बाद उनकी गति कुछ धीमी हो गई और बाकी के धावक उनसे आगे निकल गए थे। खास बात ये है कि 400 मीटर की इस रेस में मिल्खा उसी एथलीट से हारे थे, जिसे उन्होंने 1958 कॉमनवेल्थ गेम्स में हराकर स्वर्ण पदक जीता था।

रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह पांचवीं हीट में दूसरे स्थान पर आए। क्वार्टरफाइनल और सेमीफाइनल में भी उनका स्थान दूसरा रहा। लेकिन, फाइनल में वे पदक न जीत सके। हालांकि, पदक हारने के बाद भी मिल्खा को दर्शकों का खूब साथ मिला।

वर्ष 1960 में मिल्खा सिंह ने पाकिस्तान में इंटरनेशनल एथलीट प्रतियोगिता में भाग लेने से इनकार कर दिया था। असल में वो दोनों देशों के बीच के बंटवारे की घटना को नहीं भुला पाए थे। इसलिए पाकिस्तान के न्योते को ठुकरा दिया था। हालांकि, बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें समझाया कि पड़ोसी देशों के साथ मित्रतापूर्ण संबंध बनाए रखना जरूरी है। इसके बाद उन्होंने अपना मन बदल लिया।

अब्दुल खालिक को हराकर फिर रचा इतिहास

पाकिस्तान में इंटरनेशनल एथलीट में मिल्खा सिंह का मुकाबला अब्दुल खालिक से हुआ। यहां मिल्खा ने अब्दुल को हराकर इतिहास रच दिया। इस जीत के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान ने उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ की उपाधि से नवाजा। इस जीत के बाद राष्ट्रपति अयूब खान मिल्खा सिंह से कहा था, ‘आज तुम दौड़े नहीं उड़े हो। इसलिए हम तुम्हे फ्लाइंग सिख के खिताब से नवाजते हैं।’ इसके बाद से मिल्खा सिंह को पूरी दुनिया में ‘फ्लाइंग सिख’ के नाम से जाना जाने लगा।

किताबें और फिल्म

मिल्खा सिंह के जीवन पर कई किताबें भी लिखी गई हैं। इनमें रेस ऑफ माई लाइफ, फ्लाइंग सिख शामिल हैं। इसके अलावा इनके जीवन पर एक बायोपिक ‘भाग मिल्खा भाग’ भी बनी है। इस फिल्म में मिल्खा सिंह का किरदार कलाकार फरहान अख्तर ने निभाया था।

मिल्खा की कहानी सिर्फ पदकों या उपलब्धियों की ही नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत में ट्रैक और फील्ड खेलों का पहला अध्याय लिखने की भी है जो आने वाली कई पीढियों को प्रेरणा देगी।