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उत्तर प्रदेश न्यूज

AHC बार एसोसिएशन ने दाखिल की याचिका, कहा- बंद हो अवैध आयकर वसूली, चुकता टैक्स भी वापस मिले

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने आयकर विभाग के खिलाफ एक अभूतपूर्व कदम उठाया है। आयकर विभाग द्वारा वसूले गए करीब 40 लाख रुपये के टैक्स और नए कर पुनर्निर्धारण नोटिस के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बार एसोसिएशन ने मांग की है कि एसोसिएशन से अवैध आयकर वसूली बंद हो। साथ ही पूर्व में कर के रूप में वसूला गया करीब 40 लाख रुपये भी वापस दिलाए जाएं।

कर विशेषज्ञ एवं वित्त सलाहकार डॉ पवन जायसवाल ने कहा कि गलत तरीके से आयकर के रूप में बार एसोसिएशन से ₹39,68,313 की वसूली गई है। यह रकम आयकर विभाग ने कर निर्धारण वर्ष 2017-18 के लिए एकपक्षीय कार्रवाई करते हुए दिसंबर 2019 में आदेश पारित करते हुए वसूला था।

इस आदेश से क्षुब्ध होकर बार एसोसिएशन की वर्तमान कार्यकारिणी ने आयकर अधिकारी-1(5) के खिलाफ दिसंबर 2020 में आयकर अधिनियम 1961 की धारा-264 के तहत आयकर आयुक्त के सामने रिवीजन पिटीशन फाइल किया।

बताया कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान संक्रमण की चपेट में आने से बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं का भी निधन हो गया। बार एसोसिएशन ने प्रत्येक मृतक अधिवक्ताओं के पीड़ित परिजनों को 5 लाख रुपये की आर्थिक मदद का ऐलान किया है। लगभग 130 से ज्यादा छतिपूर्ति देना बाकी है। ऐसे में आयकर विभाग द्वारा जबरन वसूले गए करीब ₹4000000 की वापसी बार एसोसिएशन के लिए संजीवनी का कार्य कर सकती है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन सन 1958 में सोसाइटी रजिस्ट्रार के सम्मुख पंजीकृत है। एसोसिएशन सिर्फ अपने सदस्यों के आपसी लाभ के लिए कार्य करता है। गौरतलब है कि म्यूचुअल बेनिफिट के लिए कार्य करने वाले एसोसिएशन की आय पूर्णतया कर मुक्त होती है।

एसोसिएशन की आय का मुख्य स्रोत सदस्यता शुल्क एवं शपथ पत्र सेंटर से प्राप्त रकम प्रमुख है। साथ ही साथ बार के सदस्यों के बीमारी इलाज एवं मृत्यु की दशा में क्षतिपूर्ति के लिए बचाए गए फंड को सावधि जमा में निवेश पर ब्याज भी आय का स्रोत है। बार एसोसिएशन एडवोकेट वेलफेयर फंड नाम से भी अपना खाता स्टेट बैंक में चलाते हैं। हालांकि, बार एसोसिएशन किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि नहीं करता है। फिरभी, यदि लगातार आयकर जमा करने की नौबत आ गई तो परस्पर लाभ पहुंचाने वाला बार का फंड भविष्य में समाप्त हो सकता है। इसके अधिवक्ताओं की होने वाली आर्थिक मदद का काम भी ठप पड़ जाएगा।

डॉ जायसवाल के अनुसार दिसंबर 2020 में फाइल आयकर अधिनियम 1961 की धारा-264 की रिवीजन पिटीशन का निपटारा तो नहीं किया गया। बल्कि, कर निर्धारण वर्ष 2016-17 के लिए कर लगाने के उद्देश्य से धारा 148 में दुबारा 28 मार्च 2021 के एक और नोटिस आयकर विभाग के आयकर अधिकारी-1 (3) द्वारा जारी कर दिया गया है।

बताया गया है कि जनवरी एवं फरवरी 2021 में धारा-264 के पिटीशन को निस्तारित करने के लिए बार एसोसिएशन ने दो अनुस्मारक भी आयकर आयुक्त को दिए। किंतु, कर निर्धारण वर्ष 2017-18 के विवाद का निस्तारण न करते हुए कर निर्धारण वर्ष 2016-17 का भी केस धारा-148 के अंतर्गत खोल दिया गया है।

एक कर मुक्त एसोसिएशन होने के नाते अवैधानिक नोटिस एवं आदेशों के खिलाफ बार एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं दायर कर दी हैं। ताकि उच्च न्यायालय में 10000 से भी अधिक अधिवक्ताओं के परस्पर हित में काम करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को आयकर से राहत मिल सके।

इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष अनिल पाठक ने कहा कि पूर्व की कार्यकारिणी ने कर भुगतान किया था। वर्तमान कार्यकारिणी के सामने यह मामला आने पर इसे आयकर विभाग के सामने उठाया गया। विभाग से प्रकरण निस्तारित न होने पर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। 9 जून 2021 को इस मामले की सुनवाई संभावित है।

उनका कहना है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया ही नहीं, किसी भी एसोसिएशन पर आयकर भी नहीं लगता है। बार के सभी सदस्य आयकर का भुगतान करते हैं। कर देने के बाद बार एसोसिएशन को सदस्यता शुल्क देते हैं। इससे बार को कोई आमदनी नहीं होती है। जो भी सदस्यता शुल्क मिलता है, वह सदस्यों के वेलफेयर पर ही खर्च किया जाता है।

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Ranvijay Singh

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