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14 साल से अटका था छह स्टील्थ पनडुब्बियों का निर्माण, एक दशक में नौसेना में होगी शामिल

रक्षा सेनाओं की जरूरतों के मुताबिक हथियारों को उपलब्ध कराने में टालमटोल का खामियाजा नौसेना किस कदर भुगत रही है, इसकी एक बानगी स्टील्थ पनडुब्बियों के निर्माण में भी सामने आया है। 14 साल पहले मंजूरी के बाद अब इनके निर्माण को हरी झंडी मिल सकी है। वैसे कहा जाता है की प्रोजेक्ट-75 का विचार अटल बिहारी बाजपेई सरकार के दौरान पहली बार सामने आया था, लेकिन वाजयेई सरकार सत्ता में न लौट पाने के कारण यह प्रोजेक्ट बुरी तरह बिछड़ गया। मजबूरी में नौसेना को पुरानी पनडुब्बियों से काम चलाना पड़ रहा है। रोचक यह है कि मनमोहन सरकार के सात साल यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी तो मोदी सरकार में भी यह प्रोजेक्ट सात साल तक पड़ा रहा।

फिलहाल, हिन्द महासागर में अन्य देशों का मुकाबला करने के लिए भारत छह स्टील्थ पनडुब्बियों का निर्माण खुद स्वदेशी प्रोजेक्ट-75 आई के तहत करने जा रहा है। विदेशी सहयोग से घरेलू निर्माण के लिए 14 साल से लंबित 43 हजार करोड़ रुपये की इस परियोजना को आज औपचारिक रूप से मंजूरी मिल गई। इन पनडुब्बियों को नौसेना के बेड़े में शामिल होने में लगभग एक दशक लगेगा। रणनीतिक भागीदारी मॉडल के तहत भारतीय नौसेना के लिए पी-75 आई श्रेणी की 6 पनडुब्बियों का निर्माण ‘मेक इन इंडिया’ पहल के अनुरूप भारत में ही किया जाएगा।

‘मेक इन इंडिया’ के तहत रणनीतिक साझेदारी की पहली परियोजना

रक्षा अधिग्रहण परिषद की अध्यक्षता करते हुए शुक्रवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लगभग 43 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली परियोजना को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी। इस प्रोजेक्ट-75 आई के तहत भारत में ही एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) फिटेड 06 नई पारंपरिक स्टील्थ पनडुब्बियों का निर्माण किया जाएगा। प्रोजेक्ट-75 आई को पहली बार नवम्बर, 2007 में प्रारंभिक मंजूरी मिली थी, तब से यह परियोजना लंबित थी। वर्तमान सरकार ने मई, 2017 में ‘मेक इन इंडिया’ प्लेटफॉर्म के तहत इस परियोजना को देश के सामने दोबारा रखा।

रणनीतिक भागीदारी मॉडल के तहत लंबी प्रक्रिया के बाद रक्षा मंत्रालय ने दो भारतीय फर्मों लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (एमडीएल) को चुना था। ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के लिए सरकार की मई, 2017 में शुरू की गई रणनीतिक साझेदारी (एसपी) नीति के तहत यह पहली परियोजना बन गई है।

ये विदेशी कंपनियां करेंगी सहयोग

निर्माण में सहयोग के लिए पांच विदेशी कंपनियों में जर्मनी की थायसीनक्रूप मरीन सिस्टम, रूस की रुबिन डिजाइन ब्यूरो, स्पेन की नवानतिया, फ्रांसीसी जहाज निर्माता कंपनी नेवल ग्रुप और साउथ कोरिया की देवू शिपबिल्डिंग एंड मरीन इंजीनियरिंग कंपनी को चुना गया है। आरएफपी जारी होने के बाद दोनों भारतीय रणनीतिक साझेदार एमडीएल और एलएंडटी अपनी तकनीकी और वित्तीय बोलियां जमा करने के लिए पांच चयनित विदेशी शिपयार्डों में से एक के साथ गठजोड़ करेंगे। सामरिक मॉडल के तहत भारतीय कंपनी अपनी विदेशी भागीदार कंपनी के साथ मिलकर देश में उत्पादन इकाई बनाएगी और पनडुब्बियों का डिजायन तथा प्रौद्योगिकी हासिल करेगी।

फ्रांस से पहले बैच में मिले पांच राफेल जेट को वायुसेना के बेड़े में शामिल करने के मौके पर पिछले साल भारत आईं फ्रांसीसी रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पैली और भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच 10 सितम्बर को हुई द्विपक्षीय वार्ता में पी-75 आई प्रोजेक्ट की पनडुब्बियों के बारे में भी चर्चा हुई थी।

स्टील्थ सबमरीन की विशेषताएं

स्टील्थ सबमरीन यानी गुप्त पनडुब्बी पानी के अंदर अभियानों को अंजाम देती है। इसलिए दुश्मन को स्टील्थ पनडुब्बी की गतिविधियों का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। परमाणु क्षमता से लैस न होने वाली पनडुब्बियों को एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (एआईपी) सिस्टम के जरिए स्टील्थ कपैसिटी दी जाती है।

स्टील्थ सबमरीन क्यों जरूरी है

हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती युद्धपोतों की चहलकदमी से नौसेना को पारंपरिक और परमाणु दोनों तरह की नई पनडुब्बियों की सख्त जरूरत है। भारत को कम से कम 18 पारंपरिक पनडुब्बियों, छह एसएसएन और चार परमाणु-संचालित पनडुब्बियों की जरूरत है। पी-75 आई प्रोजेक्ट के तहत पहली पनडुब्बी को रोल आउट करने में कम से कम एक दशक का समय लगेगा। नौसेना के पास वर्तमान में केवल 12 अन्य पुरानी डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां हैं, जिनमें से केवल आधी चालू हैं और अगले साल एक के सेवानिवृत्त होने की उम्मीद है।

भारत के पास दो परमाणु-संचालित पनडुब्बियां आईएनएस अरिहंत और आईएनएस चक्र भी हैं, लेकिन आईएनएस चक्र के पास परमाणु-टिप वाली बैलिस्टिक मिसाइल नहीं है क्योंकि इसे रूस से पट्टे पर हासिल किया गया है।

इनपुट- हिन्दुस्थान समाचार