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काशी क्षेत्र विधि प्रकोष्ठ के संयोजक ने भाजपा अध्यक्ष को लिखी खुली चिट्ठी, कहा- चमचों-दलालों से घिरा है नेतृत्व

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ ही सूबे में बदलाव की अटकलों के बीच मूल भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी खुलकर प्रकट होने लगी है। काशी क्षेत्र विधि प्रकोष्ठ के संयोजक देवेंद्रनाथ मिश्र ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष को खुला पत्र लिखकर मूल कार्यकर्ताओं की भावनाओं को आवाज दी है। `नेशनल व्हील्स` से बातचीत में उन्होंने पूरी साफगोई से कहा कि 2014 से केंद्र और 2017 से उत्तर प्रदेश में पार्टी की सरकारें हैं। कार्यकर्ताओं को रोजाना काम सौंपा जाता है लेकिन लाभ देने की बारी आती है तो सपा, बसपा, कांग्रेस जैसी पार्टियों से आने वालों को मलाई बांट दी जाती है। सत्ता की मलाई बाहरी लोग चाट रहे हैं और विपक्ष में रहने के दौरान लाठी-डंडा खाने वाले कार्यकर्ता उदास होकर घरों में बैठ गए हैं।

फेसबुक पर खुला पत्र लिखकर देवेंद्रनाथ मिश्र ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार बने चार साल पूर्ण हो चुके हैं। इन चार सालों में उत्तर प्रदेश में पार्टी के मूल कार्यकर्ता हाशिए पर ही रहे हैं। संगठन की बागडोर कमजोर हाथों में होने का दुष्परिणाम ये हुआ कि पार्टी के वरिष्ठ, खांटी, निष्ठावान और ईमानदार कार्यकर्ता का आर्थिक, सामाजिक, मानसिक नुकसान जमकर हुआ। बाहरियों और चमचों, दलालों से घिरे रहने के कारण वर्तमान नेतृत्व और लगभग सभी अतिविशिष्ठ नेतागण न तो क्षेत्र में विशेष ध्यान दिए और न ही पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं का सम्मान और समायोजन किया।

उनका कहना है कि अब चुनाव सिर पर है तो भरपाई कठिन है. जितने भी लोगों को ऊपर से प्रदेश का भाग्य विधाता बना कर भेजा गया वो सभी स्वार्थी और अयोग्य सिद्ध हुए। ऐसे लोग हवा-हवाई आनंद लेते रहे। पंचायत चुनाव के परिणाम सेमी फाइनल है। अब विधान सभा चुनाव फाइनल होगा।

कहा कि यूपी में विधानसभा लड़कर जीते विधायकों में से न चुनकर ऊपर तीनों सत्ता के केंद्र बिंदु बने लोग निरंकुशता के साथ जातिवाद और स्वार्थवाद में पार्टी और कार्यकर्ताओं का कोई खास भला नहीं किया। रही-सही कसर संगठन ने पूरी कर दी हैं। कुछ ठोस निर्णय लें ताकि ज्यादा नुकसान से पार्टी को बचाया जा सके। लिखा कि महंगाई, भ्रष्टाचार और अराजकता पर भी कोई उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं होने के कारण लोग त्राहि त्राहि कर रहे हैं।

कार्यकर्ताओं के शोषण की बात कहते हुए लिखा है कि पूरे चार साल कार्यकर्ताओं से जमकर मजदूरी कराई गई। मगर, किसी भी संकट में लोगों ने सिर्फ खानापूर्ति करते हुए कार्यकर्ताओं को भगवान भरोसे छोड़ रखा है। पार्टी सेवा में लगे जाने कितने कार्यकर्ताओं ने कोरोना काल में अपनी जान गंवाई। उनके परिजनों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।

नियुक्तियों को लेकर भी देवेंद्र ने पीड़ा जताई कि प्रदेश सूचना आयुक्त पद हो या सरकारी वकीलों की नियुक्ति या कारपोरेशन, बैंक, निगमों आदि की नियुक्ति में जमकर अनियमितता हुई। इसमें पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं का हक ही नहीं मारा गया, बल्कि उनके भविष्य से गंभीर खिलवाड़ किया गया। अनेकों पद पर नियुक्तियों में पार्टी के कार्यकर्ताओं का हक जिम्मेदार लोगों ने मार दिया।

लगभग सभी लाभ के पदों पर दूसरी पार्टियों से आए लोगों को बैठाया गया। वर्तमान महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह ने लखनऊ से लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक पार्टी के मूल संगठन के अधिवक्ताओं को हाशिए पर रखकर अपनी निजी सेना को उपकृत करने का काम किया। प्रदेश के जिम्मेदार लोगों द्वारा खांटी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा समझ से परे है। वर्तमान में पार्टी के 100% मूल कार्यकर्ता असंतुष्ट हैं। सिर्फ लाभार्थी ही संतुष्ट होंगे।

देवेंद्र का कहना है कि जिम्मेदार नेता तर्क देते हैं कि बाहर से लोग आए हैं, तभी पार्टी का विस्तार हुआ है। इनका भी ध्यान रखना होगा। इससे काम नही चलने वाला है। आखिर पुराने कहां जाएं? पुराने लोगों का सम्मान और नए लोगों का स्वागत होना चाहिए। 24 घंटे 365 दिन काम करने के नाम पर संगठन के जिम्मेदार लोगों को लगता है कि जैसे सिर्फ नौकरी कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं के सुख-दुख-सम्मान की चिंता क्यों नही की जा रही है?

टिकट वितरण व्यवस्था पर भी देवेंद्र ने सवाल उठाए हैं। कहा कि योग्य कार्यकर्ताओं की तलाश की जगह मनमाने ढंग से टिकट वितरण किए जाते हैं। इससे पार्टी को नुकसान होने पर जिम्मेदारों के प्रति जवाबदेही क्यों सुनिश्चित नही की जाती? हजारों कार्यकर्ता तीन-चार दशक से पार्टी के लिए जान देने वाले हैं। उनकी उपेक्षा के लिए कौन जिम्मेदार है? तानाशाही प्रवित्ति हावी है।

वर्तमान नेतृत्व से मूल कार्यकर्ता अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। पंचायत चुनाव परिणाम की जैसी आशा हम लोगों को थी वही आया है। लिखा कि तीन दशक के ऊपर की पार्टी की राजनीति में ऐसा खराब अनुभव मेरा कभी नही रहा। पार्टी हमारी मां है और इसकी चिंता करना हमारी जिम्मेदारी। लगभग सभी जिलों में पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा से उनकी दूसरी पीढ़ी का पार्टी से मोहभंग हो रहा है।

बातचीत में कहा कि कार्यकर्ताओं को काम रोजाना मिलता है लेकिन सम्मानजनक समायोजन नहीं हुआ। 1500 सरकारी वकील बने, लेकिन इसमें बमुश्किल 36-37 फीसदी मूल भाजपाई और आनुषंगिक संगठनों के कार्यकर्ता ही सरकारी वकील बन सके। बाकी लोग जुगाड़ू हैं, जो सरकार बदलने पर बदल जाएंगे। कहा कि पंचायत चुनाव में पैसा लेकर टिकट बांटा गया। चुनाव परिणाम में अधिकतर प्रत्याशी हार गए।

देवेंद्र की पीड़ा अनायास नहीं है। जानकार बताते हैं कि 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में दिल्ली में भाजपा सरकार बनी तो पिछली सरकारों की तरह कार्यकर्ताओं ने उम्मीद लगाई कि केंद्र सरकार से 746 लाल बत्तियां बंटेंगी। लोकसभा टिकट से वंचित और तमाम वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का इससे समायोजन होगा। परंतु, ऐसी खींचतान मची कि आज तक ज्यादातर महत्वपूर्ण पदों पर कांग्रेसी और वामपंथी ही काबिज हैं। पार्टी नेता एक उदाहरण भी देते हैं कि वर्ष 2004 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन होने के ठीक एक महीने के अंदर मानव संसाधन मंत्री बने अर्जुन सिंह ने शिक्षण संस्थाओं समेत तमाम महत्वपूर्ण पदों पर लाए गए आरएसएस समर्थकों को एक झटके में बदल डाला था। जबकि, न मोदी सरकार और न ही यूपी में योगी सरकार ऐसा कर सकी। यूपी में भी अखिलेश सरकार के दौरान विभिन्न विभागों में समायोजित लोग अब तक काम कर रहे हैं। अधिकतर ठेके-पट्टों में भी सपाइयों का ही बोलबाला है। भाजपा कार्यकर्ताओं की पीड़ा की एक वजह यह भी है।