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योगी का नौकरशाही पर ‘अंधविश्वास’ कहीं न निकाल दे मिशन-2022 की हवा

अजय कुमार

लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। अप्रैल से पूरे चुनावी में उतरने की तैयारी कर चुकी योगी सरकार के पांव कोरोना महामारी ने थाम दिए हैं। चुनावी तियारियों के पिछड़ने के साथ ही योगी सरकार के मंत्रियों और विधायकों की मुख्यमंत्री से नाराजगी भी इन दिनों सिर चढ़कर बोल रही है। चर्चा यह भी शुरू हो गई है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ब्यूरोके्रसी यानी नौकरशाही के प्रति हद से ज्यादा झुकाव योगी कैबिनेट के मंत्रियों, पार्टी के जनप्रतिनिधियों, नेताओं, कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रही है। कोरोना महामारी के समय जनता की मदद करने में असहाय नजर आ रहे जनप्रतिनिधियों का गुस्सा सरकार के खिलाफ खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। नाराज पार्टी नेताओं का कहना है कि ब्यूरोके्रसी का काम शासन -प्रशासन एवं लाॅ एंड आर्डर संभालना है, न कि सरकार चलाना। अगर ‘सरकार’ भी नौकरशाह चलाएंगे तो फिर चुनाव ही क्यों होते हैं ? क्यों चुने जाते हैं जनप्रतिनिधि ? आखिर जनता का सामना तो जनप्रतिनिधियों को ही करना होता है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोरोना महामारी के दूसरे दौर में खुद पाॅजिटिव हुए, लेकिन रिपोर्ट निगेटिव आने के दूसरे ही दिन से भ्रमण शुरू कर दिया। 24 मई तक मुख्यमंत्री करीब 50 जिलों का दौरा कर चुके हैं। जनता से सीधे रूबरू हो रहे हैं। जनता की जरू,त के अनुसार सरकारी आदेशों, व्यवस्थाओं, नीतियों में लगातार परिवर्तन भी कर रहे हैं। जनता में इसका सकारात्मक संदेश भी है। उम्मीद जताई जा रही है कि बिना ब्रेक की गाड़ी बनी महामारी के पांव थामने में सफलता भी मिली। परंतु, ये गतिविधियां चुनाव जिताऊ बन सकेंगी, इसमें अंदेशा है। चुनाव जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता मिलकर लड़ते हैं। सीएम के दौरे से तमाम मंत्री भी नदारद हैं। स्थानीय विधायक और सांसद अपनी बात मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि नौकरशाहों तथा राजनितिक दलों को जहाँ पर भी संभव हो वहां एक दूसरे को सहयोग देना चाहिए, क्योंकि दोनों ही जनता के प्रति जवाबदेही होती हैं। दोनों का ही ‘धर्म’ जनता की सेवा करना होता है। रही बात नौकरशाहों के सरकार चलाने की तो, यह नौकरशाही नहीं तय करती है कि वह सरकार चलाएगी। इसके लिए काफी हद तक सरकार का मुखिया जिम्मेदार होता है। कहा जा रहा है कि योगीजी जिस नौकरशाही को अपनी ताकत समझते हैं, उसी नौकरशाही को पूर्व मुख्यमंत्रियो ने कभी सिर पर नहीं चढ़ाया। मायावती ब्यूरोके्रसी को ‘जूते की नोंक पर’ रखती थीं। नौकरशाह पूर्व मुख्यमंत्री का नाम सुनते ही कांपने लगते थे। अधिकारियों को यह पता रहता था कि मुख्यमंत्री के पास पूरे प्रदेश की खबर रहती थी। जिलों में मौजूद बसपा के तमाम नेता और कार्यकर्ता बसपा नेत्री के लिए खुफिया तंत्र की तरह काम करते थे। इसीलिए किसी अधिकारी की हिम्मत नहीं थी कि वह माया को बरगला या उनके हुकुम की नाफरमानी करने की सोच भी सके।

अधिकांश जिलों के जिलाधिकारी और एसएसपी/एसपी मुख्यमंत्री के आदेश की अवहेलना करने से इसलिए भी नहीं डरते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि सीएम उन्हीं पर पूरी तरह से आश्रित हैं। मायावती सरकार में डरी सहमी रहने वाली नौकरशाही अखिलेश सरकार में आजादी मिलते ही इतनी स्वच्छंद हो गयी कि उसकी चाल ही बिगड़ गई। खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को एक बार आइएएस वीक में कहना पड़ गया था, ‘अगर वह सम्मान देना जानते हैं तो सजा देना भी आता है।’ पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी अक्सर कहा करते थे कि ब्यूरोके्रसी सरकारी योजनाओं को आम जनता तक पहुंचते ही नहीं देते हैं।

बसपा सुप्रीमों मायावती के अलावा यदि कोई  ब्यूरोके्रसी पर अपने हिसाब से नकेल डाल पाया तो वह थे भाजपा नेता कल्याण सिंह। कल्याण सरकार का पहला कार्यकाल इस हिसाब से काफी यादगार रहा था। कल्याण सिंह कहा करते थे कि ब्यूरोके्रसी बेलगाम घोड़े की तरह  है। नेता रूपी घुड़सवार की रान में जितनी ताकत होगी, वह ‘घोड़े’को उतनी फुर्ती से नियंत्रित कर लेता है, लेकिन हकीकत यह भी है कि दोबारा सत्ता में आने के बाद कल्याण सिंह ने भी ब्यूरोके्रसी के बीच अपनी हनक खो दी थी।

बात योगी की कि जाए तो पार्टी नेताओं को किनारे करके ब्यूरोके्रसी को हद से ज्यादा महत्व दिए जाने की वजह से पार्टी का आलाकमान भी चिंतित है। योगी का अपनी ब्यूरोके्रसी पर विश्वास का यह आलम है कि इसके आगे वह पार्टी के बड़े नेताओं को भी तरजीह नहीं देते।

मोदी की इच्छा के अनुरूप जब गुजरात के तेजतर्रार आईएएस अरविंद शर्मा को इस्तीफा दिलाकर उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य बनाया गया तो राजनैतिक पंडितों ने कहना शुरू कर दिया कि अरविंद को यूपी की बेलगाम नौकरशाही को नियंत्रित करने के लिए भेजा गया है। अरविंद के डिप्टी सीएम तक बनाए जाने की चर्चा होने लगी, परंतु योगी ने उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना तो दूर एक अद्द घर तक नहीं मुहैया कराया। राजनैतिक गलियारे में चर्चा आम है कि सीएम योगी की इसी जिद्द के चलते  आलाकमान को लगने लगा है कि यही हाल रहा तो आठ-दस महीनें बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ सकता है। कोरोना महामारी के चलते वैसे ही जनता योगी सरकार से नाराज चल रही है। ऐसे में यदि पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भी नाराज होकर घरों में बैठ गए तो बीजेपी के लिए मिशन-2022 को पूरा करना मुश्किल हो सकता है।

भारतीय जनता पार्टी के बलिया से विधायक सुरेंद्र सिंह का बयान यह बताने के लिए काफी है कि पार्टी में योगी को लेकर नाराजगी किस हद तक बढ़ती जा रही है। श्री सिंह ने कोरोना प्रबंधन में बदइंतजामी को लेकर योगी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि नौकरशाही के जरिये कोविड पर नियंत्रण का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रयोग असफल रहा है।  उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में यह व्यवस्था की कमी ही माना जाएगा कि भाजपा के मंत्री व विधायक कोविड का शिकार हो रहे हैं तथा उन्हें समुचित चिकित्सा सुविधा तक नहीं मिल पा रही है। विधायक ने कहा कि व्यवस्था जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि केंद्रित होनी चाहिए न कि नौकरशाही केंद्रित लेकिन मुझे दुख है कि देश व सूबे में भाजपा की सरकार होते हुए भाजपा के मंत्री व विधायक दवा के अभाव में मर रहे हैं। गाजियाबाद के विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने जिला प्रशासन पर ऑक्सीजन की कालाबाजारी का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। यह अप्रत्यक्ष तौर पर सरकार के खिलाफ मोर्चा माना जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के बरेली जिले के नवाबगंज विधानसभा क्षेत्र से सदस्य केसर सिंह, लखनऊ पश्चिम के विधायक सुरेश कुमार श्रीवास्तव, औरैया सदर के विधायक रमेश चंद्र दिवाकर की कोविड संक्रमण से मौत हो गई थी। योगी सरकार की कार्यप्रणाली पर  एक के बाद एक उनके ही सिपहसालार उंगलियां उठा रहे हैं। कोई विधायक खुलेआम बयानबाजी कर रहा है तो कोई ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा है। ऐसा नहीं है कि किसी एक विधायक ने अपनी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाया हो, भाजपा सांसद और विधायक लगातार कोविड से निबटने में अपनी पार्टी की सरकार की खामियों को उजागर कर रहे हैं और अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों से तीखे सवाल पूछ रहे हैं। नाराज नेताओं का कहना है कि उनके मतदाता जब अस्पताल में बेड या ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए उनके पास आते हैं तो वे उनकी कुछ मदद नहीं कर पाते। कई भाजपा कार्यकर्ता कोविड के कारण जान गंवा चुके हैं लेकिन सत्तारूढ़ दल के सांसद और विधायक असहाय होकर देखते रह गए। संकट के समय उनके मतदाताओं को जब उनकी मदद की जरूरत होती है तो वे उनके पास नहीं होते. नौकरशाही सुनती नहीं है। ऐसे मेें किस मुंह से हम चुनाव में जनता से वोट मांगने जाएंगे।

पार्टी के नेताओं का योगी सरकार से नाराजगी की एक वजह यह भी है कि कोविड महामारी की दूसरी लहर में शहर में दहशत फैलाने के बाद कोरोना गांवों को भी अपनी चपेट में ले रहा है और इससे निबटने में योगी सरकार जिस तरह लड़खड़ा रही है उसके कारण भाजपा के सांसद और विधायक महसूस करने लगे हैं कि वे मोदी-योगी के सिपाही भले हों लेकिन मतदाता उन्हें इसी आधार पर आंकेंगे कि जब उन्हें अपने प्रतिनिधियों की सबसे ज्यादा जरूरत थी तब वे क्या कर रहे थे। और जब उम्मीदवार की जीतने की क्षमता का सवाल हो, तब कोई भी दल और भाजपा सबसे ज्यादा, इस मामले में कोई समझौता नहीं कर सकती, भले ही वर्तमान प्रतिनिधि का टिकट क्यों न काटना पड़े। यही वजह है कि भाजपा के सांसद और विधायक जब यह देख रहे हैं कि मतदाता जरूरत के समय अपने प्रतिनिधियों को सहायता के लिए मौजूद नहीं होने के कारण नाराज हो रहे हैं, तो इससे जनप्रिितनिधियों में दहशत जोर पकड़ रही है। इसी वजह से जनप्रतिनिधियों ने योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
    योगी सरकार से नाराज विधायकों की लिस्ट लगातार लम्बी होती जा रही है। योगी के गढ़ गोरखपुर के सदर विधायक डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल, सुल्तानपुर के बीजेपी विधायक देवमणि द्विवेदी, सीतापुर शहर सीट से विधायक राकेश राठौर, हरदोई सिे बीजेपी सांसद जय प्रकाश रावत और यहीं के गोपामऊ विधानसभा से भारतीय जनता पार्टी के विधायक श्याम प्रकाश  के अपनी ही सरकार से नाराज रहने की चर्चा आम है। पिछले वर्ष अगस्त के महीने में बीजेपी विधायक ने अलीगढ़ के एक प्रकरण को आधार बनाकर अपने समकक्ष बीजेपी विधायकों को यहां तक नसीहत दे दी थी कि वह  अपना सम्मान और स्वाभिमान को सुरक्षित रखने के थाने और अधिकारियों के पास न जाएं।

अलीगढ़ में बीजेपी विधायक के साथ मारपीट प्रकरण पर उन्होंने  अपनी सरकार को घेरते हुए यूपी पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़ा करते हुए अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लिखा था कि प्रोटोकॉल के अनुसार विधायक का दर्जा मुख्य सचिव के बराबर है। अपने सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा करनी है तो इस समय विधायकों को थाना तथा अधिकारियों के पास नहीं जाना चाहिए। इसके अगले दिन उन्होंने अलीगढ़ प्रकरण से संबंधित मामले पर वीडियो डालते हुए फिर अपनी सरकार की चुटकी लेते हुए लिखा,‘रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा भी दिन आएगा. एक दारोगा एमएलए से तू, तेरे, तुझको कहकर के, हाथ पैर भी तोड़ेगा। माननीय मुख्यमंत्री जी विधायकों पर कुछ तो कृपा कीजिए। आप ही विधायकों के संरक्षण और नेता हैं. हम लोग जाएं तो जाएं कहां? इस दारोगा पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यहां तक की एक बार तो विधान सभा तक में बीजेपी के कुछ विधायकों ने ही सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया था। यह तय है कि चुनावी साल में यदि योगी ने अपनी कार्यशैली नहीं बदली तो इसका खामियाजा भाजपा को उठाना पड़ सकता है। भाजपा आलाकमान यह कभी नहीं चाहेगी कि यूपी उसके हाथ से निकले। इस लिए केन्द्र को जल्द से जल्द बद से बदत्तर होते यूपी के बारे में कोई फैसला लेना पड़ेगा, क्योंकि जमीनी हकीकत यही है कि योगी की ईमानदार छवि होने के बाद भी जनता उनके काम करने के तौर तरीकों से खूश नहीं है। योगी के एकला चलो के रवैये के चलते आरएसएस ने भी यूपी से दूरी बना ली है। क्योंकि संघ जमीन पर काम करता है और उसका के्रडिट नौकरशाही ले जाती है।

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Ranvijay Singh

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