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#NCR के रोस्टर घोटाले के आरोपियों पर कार्रवाई में भी भ्रष्टाचार की बू ?

#NCR के रोस्टर घोटाले के आरोपियों पर कार्रवाई में भी भ्रष्टाचार की बू ?

प्रयागराज : उत्तर मध्य रेलवे प्रयागराज डिवीजन में हुए रोस्टर घोटाले के आरोपियों पर संदिग्ध कार्रवाई में भी भ्रष्टाचार की दुर्गंध आ रही है। रेलवे के वाणिज्यिक प्रशासन ने विजिलेंस जांच पूरी हुए बिना ही मुख्य आरोपियों के खिलाफ आननफानन में कार्रवाई कर पूरे प्रकरण को दबाने की कोशिश कर डाली है। आशंका जताई जा रही है कि इस कार्रवाई में आरोपियों और कार्रवाई करने वाले अफसरों के बीच “डील” हुई है। यह “डील” कैसी और किस रूप में है? इसकी जांच प्रमुखता से होनी चाहिए, अन्यथा रेलवे कर्मचारियों को दूसरे रोस्टर घोटाले जैसी दूसरी वित्तीय गड़बड़ियों का नया मौका देने जैसा साबित होगा।

रोस्टर घोटाला मामले में कार्रवाई से संबंधित नई जानकारी के अनुसार दो सूचनाएं सामने आ रही हैं। पहली, मुख्य आरोपी और तत्कालीन सीआईटी रोस्टर एसके पांडे के खिलाफ सीनियर डीसीएम, प्रयागराज ने एक इंक्रीमेंट सालभर तक रोकने का आदेश दिया है। दूसरी, एसके पांडे को ग्रेड-पे 4600 से ग्रेड-पे 4200 में यानि सीआईटी से डिप्टी सीआईटी बना दिया गया है। दोनों कार्रवाई में सच क्या है यह रेलवे प्रशासन को आधिकारिक रूप से सामने लाना चाहिए। फिलहाल, जानकारों का कहना है कि इस मामले में यह अधिकतम भ्रष्टाचार पर न्यूनतम सजा के सिद्धांत को लागू करने जैसा है।

सूत्रों का दावा है कि पत्रकार संतोष उपाध्याय और भाजपा सांसदों की शिकायतों के बाद रेलवे बोर्ड ने 7 जनवरी 2022 को एमएन ओझा को पीसीसीएम पद से बिना पद का बनाया, दिन उसी प्रयागराज डिवीजन के सीनियर डीसीएम ने मुख्य आरोपी के खिलाफ कार्रवाई का यह मनमाना आदेश जारी कर दिया।

जबकि, विभागीय वाणिज्य निरीक्षक जन परिवार की प्रारंभिक जांच में ही यह साबित हो गया था कि कोरोनावायरस के दौरान सीआईटी रोस्टर ने प्रयागराज जंक्शन पर तैनात कुछ कर्मचारियों के साथ मिलीभगत कर अपने पद के हिसाब से अधिकतम भ्रष्टाचार किया। इसमें ऑनलाइन पैसे के लेनदेन की पुष्टि भी हो चुकी है। कई कर्मचारियों को बिना ड्यूटी के हाजिरी देने, एक ही ट्रेन में निरंतर ड्यूटी, हाजिरी रजिस्टर से छेड़छाड़ जैसे आरोप भी पुष्ट हो चुके हैं।

जानकारी में यह भी सामने आया है कि मुख्य आरोपी को बचाने के लिए पैसे का लेनदेन करने वाले कर्मचारियों से ऐसे एफिडेविट भी लिए गए हैं जिनसे यहां साबित किया जा सके कि लेनदेन भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ नहीं है। इसके अनुसार कर्मचारियों ने सीआईटी रोस्टर से उधार ले लिया था, जिसे खाते में भुगतान किया है। हालांकि, सीएमआई की जांच में इस तथ्य को आरोपी कर्मचारियों ने शामिल नहीं कराया है।

यही नहीं, जोनल रेलवे और रेलवे बोर्ड की विजिलेंस की जांच इस मामले में अब भी जारी है। ऐसे में एक मुख्य आरोपी को न्यूनतम सजा और दूसरे आरोपी को सीआईटी लाइन की जिम्मेदारी देकर उत्तर मध्य रेलवे के अफसर क्या साबित करना चाहते हैं, यह वही बता सकते हैं।

यहां कार्यालय महालेखाकार प्रयागराज के एक प्रकरण का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है, जिसमें कार्यालय के कुछ कर्मचारियों ने अनुशासनहीनता की थी। इस मामले में सीएजी ने 12 कर्मचारियों को रिवर्ट कर उनके मूल पदों पर भेज दिया था। कार्रवाई का यह अनोखा उदाहरण महालेखाकार में अभी कर्मचारियों के जेहन में ताजा है और उस कार्रवाई के बाद दोबारा कर्मचारी नेताओं और उनके कार्यकर्ताओं ने फैसी वैसी हिमाकत नहीं की।

पुराने अफसरों का कहना है कि उत्तर मध्य रेलवे प्रशासन और रेलवे बोर्ड को भी प्रयागराज डिवीजन में अफसरों और कर्मचारियों की मिलीभगत से संगठित तरीके से रेलवे को आर्थिक हानि पहुंचाने के मामले में ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए जो नजीर के रूप में प्रस्तुत की जाए और अफसर व कर्मचारी दोबारा ऐसी गलती करने की हिमाकत ना करें। अन्यथा की स्थिति में कर्मचारी निर्भय होकर ऐसी चोट पहुंचाते रहेंगे। कार्रवाई के तौरतरीके से ही डील की आशंका भी जताई जा रही है।

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