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एक जुमले की तरह गढ़ा जाता है ‘हिन्दू आतंकवाद’ का शिगुफ़ा

एक जुमले की तरह गढ़ा जाता है ‘हिन्दू आतंकवाद’ का शिगुफ़ा

अजय कुमार

लखनऊ । 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए बम विस्फोट का मामला एक बार फिर से सुर्खिंया बटोर रहा है। वजह वही पुरानी है और निशाने पर एक बार फिर से कांग्रेस और उसके नेता हैं, जो करीब दो दशकों से देश में ‘हिन्दू आतंकवाद’ का नैरेटिव  सेट लगे हैं।

कांग्रेस का दोहरा चरित्र ही है कि जब कोई इस्लाम से ताल्लुक रखने वाला आतंकवादी पकड़ा जाता है तो वह चीखने चिल्लाने लगती है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, लेकिन इसके उलट देश पर कथित तौर पर हिन्दू आतंकवाद का ‘लेबल’ लगाने के लिए 2008 में हुए महाराष्ट्र के मालेगांव विस्फोट के असली गुनाहागारों को छोड़कर हिन्दू नेताओं और साधू संतों को फंसाने के लिए उसकी तरफ से साजिश रची जाने लगती है। इतना ही नहीं इस कृत्य को अमलीजामा पहनाने के लिए कई कांग्रेसी नेता नहीं तत्कालीन महाराष्ट्र और दिल्ली की मनमोहन सरकार ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, सुधाकर द्विवेदी, मेजर रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त), अजय रहीरकर, सुधाकर द्विवेदी, सुधाकर चतुर्वेदी और समीर कुलकर्णी सभी को जेल भेज दिया गया था, आज की तारीख में सभी जमानत पर बाहर हैं। हालत यह थी कि इन्हें अपराध कबूलने के लिए बुरी तरह से टार्चर भी किया गया था।

अब यह खुलासा हुआ है कि उस समय की कांग्रेस सरकारों ने तत्कालीन सांसद और मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता इंदेश कुमार को भी विस्फोट कांड में आरोपी बनाने का षड़यंत्र रचा था। मालेगांव विस्फोट कांड के समय कांग्रेस के नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्गविजय सिंह, उस समय के केन्द्रीय मंत्री पी चिदंबरम कई पुलिस अधिकारियों और एटीएस के साथ मिलकर इस साजिश को अंजाम देने में लगे थे। इसमे काफी हद तक यह सफल भी हो गए थे, लेकिन समय बदला, सरकारें बदलीं और कांग्रेस की साजिश से पर्दा भी धीरे-धीरे हटने लगा है।

इतना ही नहीं देश की राजनीति का रंग-ढंग भी बदल गया है। जो नेता पहले चुनाव नजदीक आते ही मौलानाओं और मुस्लिम  धर्मगुरूओं की चौखट पर नाक रगड़ने पहुंच जाया करते थे, इफ्तार पार्टियां देना जिनका अपना शगल था, वह अब सत्ता के लिए मंदिर-मंदिर चक्कर लगा रहे हैं। माथे पर तिलक लगाए घूम रहे हैं।

ऐसे समय में जब हिन्दुत्व की राजनीति चरम पर है तब मालेगांव विस्फोट कांड में हिन्दू नेताओं और धर्मगुरूओं के फंसाने की खबर का खुलासा होने के बाद कांग्रेस के लिए मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि इस तरह के षड़यंत्र का पर्दाफाश होने के बाद वह बुद्धिजीवी चुप्पी साधे हुए हैं जो मुसलमानों के खिलाफ कथित उत्पीड़न के नाम पर हो-हल्ला मचाते रहते हैं। अब कोई पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, राहुल गांधी, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, ओवैसी, फिल्म अभिनेता नसीरूद्दीन सिद्दीकि, आमीर खान, शाहरूख खान, सपा प्रमुख अखिलेश यादव, राजद के तेजस्वी यादव जैसे लोगों और नेताओं से यह कल्पना कैसे कर सकता है कि यदि यह प्रोपोगंडा करते मिल जाते हैं कि देश में मुसलान डर हुआ है तो इस बात पर भी अपनी प्रतिक्रिया देंगे कि मालेगॉव विस्फोट कांड में हिन्दू नेताओं को फंसाने की जो साजिश की गई थी,वह शर्मनाक थी।

दरअसल, मालेगॉव विस्फोट कांड के एक गवाह के यह खुलासा करने के बाद राजनीतिक गलियारों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ कि उसके ऊपर हिन्दू नेताओं का नाम लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। आश्चर्य नहीं कि मुंबई के तत्कालीन आतंकवाद निरोधक दस्ते यानी एटीएस ने उसे योगी आदित्यनाथ और आरएसएस के चार नेताओं का नाम लेने के लिए मजबूर भी किया था और प्रताड़ित भी। तब इस एटीएस के अतिरिक्त आयुक्त थे परमबीर सिंह, जो इस समय कई गंभीर आरोपों से दो-चार हैं और फिलहाल निलंबित हैं। परमवीर से यह उम्मीद की जा सकती है कि उनकी हमेशा से ही ऐसी फितरत रही होगी, जिसमें वह सत्तारूढ़ दल के लिए उलटे-सीधे काम करते रहे होंगे।

मालेगांव मामले के गवाह ने एटीएस पर जो सनसनीखेज आरोप लगाया, वह एनआइए की विशेष अदालत के समक्ष लगाया। यह पहली बार नहीं, जब इस तरह की बातें सामने आई हैं। इससे पहले भी मालेगांव मामले के अन्य गवाह इसी तरह के आरोप लगा चुके हैं। यह भी ध्यान रहे कि महाराष्ट्र में गुजरात पुलिस के हाथों एक मुठभेड़ में मारी गई लश्कर-ए- तैयबा की आतंकी इशरत जहां को किस प्रकार कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं द्वारा निर्दाेष साबित करने की सियासी मुहिम चलाई गई थी।

इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 2008 के मालेगांव कांड में हुई गिरफ्तारियों के बाद तुष्टिकरण की सियासत करने वालों द्वारा ही कथित तौर पर हिंदू आतंकवाद का जुमला उछाला गया था। यह पहली घटना नहीं थी। 2008 में ही मुंबई में भीषण आतंकी हमले के बाद एक पुस्तक लिखकर देश-दुनिया को दहलाने वाले इस हमले को आरएसएस की साजिश बताने की बड़ी बेशर्मी से कोशिश की गई थी। जिन्होंने भी ऐसी कोशिश की, उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, लेकिन इससे यह तो पता चल ही गया कि किस तरह से समय-समय पर कुछ नेताओं और सरकारों द्वारा हिंदू आतंकवाद का हौवा खड़ा करने की चेष्टा की जाती रही थी। इस कृत्य में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के कई केंद्रीय मंत्री भी शामिल थे। उनकी ओर से भी यह कहा जा रहा था कि हिंदू आतंकवाद उभर आया है। यह वह दौर था, जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत से कहा था कि भारत को लश्कर और जैश सरीखे आतंकी संगठनों से ज्यादा खतरा हिंदू संगठनों के अतिवाद से है।

इस सबको देखते हुए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि इस सवाल का जवाब तलाशने की कोई कोशिश की जाए कि मालेगांव मामले की जांच के नाम पर देश-दुनिया को गुमराह करने की कोशिश तो नहीं की गई?

इस सवाल का जवाब इसलिए खोजा जाना चाहिए, क्योंकि आरोप-प्रत्यारोप से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह सामने आना ही चाहिए कि कहीं किसी साजिश या फिर संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तो हिंदू आतंकवाद का जुमला नहीं गढ़ा गया? यदि यह साबित होता है कि किसी राजनीतिक मकसद से हिंदू आतंकवाद का जुमला गढ़ा गया तो फिर यह भी साफ होगा कि आतंकवाद से लड़ने के नाम पर देश की सुरक्षा व्यवस्था और साथ ही जांच एजेंसियों से खिलवाड़ भी किया गया।

यह गलत नहीं है कि मालेगांव विस्फोट कांड में भाजपा और आरएसएस नेताओं को फंसाने और उनका चरित्र हनन की साजिश का खुलासा होने के बाद बीजेपी और आरएसएस नेता कांग्रेस के खिलाफ हमलावर हैं। इस हकीकत से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि कांग्रेस नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी प्रमुख सोनिया गांधी, पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद देश में हिन्दू आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रहे हैं। सलमान खुर्शीद ने तो अपनी किताब में हिन्दुओं की तुलना आतंकवादी संगठन बोको हरम और आईएसआई तक से कर दी है। आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने तब सत्तारूढ़ और अब विपक्ष में बैठी कांग्रेस एवं अन्य राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की आलोचना करते हुए कहा कि सबने मिलकर एक बड़ा पाप और अपराध किया था, हिन्दुओं को आतंकवादी ठहराने की साजिश रची गई थी। कुमार ने कांग्रेस और उसकी गठबंधन सरकार के साथ खड़े नेताओं और दलों को भी गंदी राजनीति और झूठी साजिश के साथ खड़ा होने का गुनाहागार बताया ताकि तथाकथित भगवा आतंकी मामलों में भाजपा और आरएसएस के नेताओं को फंसाया जा सके। इंद्रेश कुमार ने अपने बयान में  दावा किया कि एटीएस ने उन्हें प्रताड़ित किया और अपने कार्यालय में अवैध रूप से बैठाया। इस मामले में अब तक 220 गवाहों से पूछताछ हो चुकी है और उनमें से 15 मुकर गए हैं। कुमार ने दावा किया कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने तथाकथित भगवा आतंकी मामलों में भाजपा और आरएसएस के नेताओं को घसीटने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन किसी भी प्राथमिकी में हमारे नाम नहीं जोड़ सकी, क्योंकि उनके पास कोई सबूत नहीं था।

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