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चीन ने दुनिया पर थोप दिया है जैविक युद्ध या तीसरा विश्व युद्ध ?

कोरोना महामारी से पूरी दुनिया कराह रही है। दुनियाभर के तमाम देशों की अर्थतंत्र चौपट हो गया है। पहली लहर के बाद भारत मजबूती के साथ उभर रहा था लेकिन होली के आसपास से आई दूसरी लहर से भारत इन दिनों बेहद मुश्किलों में डाल दिया है। दुनिया भर के तमाम मित्र देश भारत की मदद के लिए आगे आ रहे हैं। हालांकि, जिन दिनों भारत महामारी से परेशान है, चीन पूरी तरह महामारी मुक्त है। वुहान शहर, जहां से कोरोना वायरस का संक्रमण पूरी दुनिया में फैला, भी खुशहाली के पुराने ढर्रे पर लौट आया है। इसी बीच चीन को लेकर एक खुलासा हुआ है कि वह कोरोना वायरस के जरिए विश्व युद्ध की तैयारी कर रहा था। चीन के विज्ञानी छह साल पहले से कोरोना वायरस को जैविक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की चर्चा कर रहे थे। चीनी विज्ञानियों और स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा 2015 में लिखे दस्तावेज से यह जानकारी सामने आई है।

अमेरिकी विदेश मंत्रालय के हाथ लगे दस्तावेजों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस वायरस को कृत्रिम तरीके से इंसानों में बीमारी फैलाने वाले वायरस में बदलकर हथियार की तरह इस्तेमाल करने की चर्चा चीनी विज्ञानियों और स्वास्थ्य अधिकारियों के बीच हुई थी। इस दस्तावेज को लेकर पहले आस्ट्रेलिया के समाचार पत्र ‘द आस्ट्रेलियन’ में रिपोर्ट सामने आई थी। बाद में ब्रिटेन के अखबार ‘द सन’ ने भी इस पर रिपोर्ट दी। इस दस्तावेज को चीन के सैनिक विज्ञानियों और वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों ने लिखा था। इसमें सॉर्स कोरोना वायरस को नए युग के जैविक हथियार के तौर पर पेश करने की बात कही गई है। अमेरिकी वायुसेना के कर्नल माइकल जे एन्सकफ का भी संदर्भ दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तीसरा विश्व युद्ध जैविक हथियारों से लड़ा जाएगा।

रिपोर्ट के अनुसार चीन के विज्ञानियों का कहना था कि वायरस को कृत्रिम तरीके से इंसानों में बीमारी फैलाने वाला वायरस बनाया जा सकता है यानी जैविक बीमारी फैलाकर किसी भी देश को तबाह किया जा सकता है। इस दस्तावेज को लिखने वालों में चीन में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी कई बड़ी हस्तियों के नाम है।

दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि 2003 में चीन को चीन सॉर्स महामारी का सामना करना पड़ा था। आशःका है कि वह मानव निर्मित जैविक हथियार हो सकता है जिसे आतंकियों ने छोड़ा हो। आस्ट्रेलियन स्ट्रेटजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पीटर जेनिंग्स ने news.com.au से कहा, “यह दस्तावेज अहम सुबूत हैं। मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें स्पष्ट तौर पर दिखता है कि चीन के वैज्ञानिक कोरोना वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन का इस्तेमाल हथियार के तौर पर करने का विचार कर रहे थे। वह सोच रहे थे कि इसे कैसे इस्तेमाल किया जाए? इन दस्तावेजों से यह भरोसा मजबूत होता है कि हम जिस महामारी का सामना कर रहे हैं वह गलती से लीक हो गए सैन्य इस्तेमाल के लिए तैयार किए गए किसी जैविक हथियार का नतीजा है।”

उन्होंने यह भी कहा कि इस दस्तावेज से यह बात भी समझ आती है कि क्यों चीन कोरोना महामारी के फैलने की जांच अन्य देशों को नहीं करने देना चाहता है? अगर यह महामारी किसी सामान्य संक्रमण के कारण होती तो जांच में चीन भी सहयोग करता, जबकि ऐसा नहीं हुआ। लीक हुए दस्तावेज का विश्लेषण करने वाले साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ रॉबर्ट पाॅटर ने कहा यह दस्तावेज निश्चित तौर पर नकली नहीं है।

गौरतलब है कि यूएन की एजेंसियां भी कह चुकी हैं कि चीन जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। अनुमान है कि महामारी के कारण दुनिया 150 लाख करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है। इटली, ब्रिटेन, अमेरिका, भारत, फ्रांस, कनाडा, ब्राजील जैसे देश बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इसका असर यह हुआ है कि हिंद महासागर के मुद्दे पर अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान और भारत ने मिलकर क्वाड समूह का गठन किया है। भारत ने चीन के खिलाफ कई आक्रामक प्रतिबंध लगाए हैं। चीन के विरोध के बावजूद यूरोपीय यूनियन ने भारत से मुक्त व्यापार समझौता करने की बातचीत करने का संकेत दिया। फ्रांस भी खुलकर भारत के साथ है। चीन के खिलाफ वैश्विक माहौल बनता दिखने लगा है।