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कहीं खुद ही वेंटिलेटर पर न पड़ा मिले ऑक्सीजन !

महेंद्र गोयल
(प्रदेशअध्यक्ष, कैट)

क्या कृत्रिम ऑक्सीजन ही ऑक्सीजन का विकल्प हो सकता है और अगर सरकारों ने यह मान लिया है कि हाँ तो फिर मेडिकल ऑक्सीजन के लिए ऑक्सीजन कहाँ से आएगी। कहीं ऐसा ना हो कि कल ऑक्सीजन भी वेंटिलेटर पर नज़र आये।

भारत की गिनती विश्व के उन चुनिंदा देशों में होती है जो बहुतायत में मेडिकल ऑक्सीजन बनाते हैं। ऑक्सीजन पानी और हवा दोनों में होती है। पानी का ऑक्सीजन मनुष्य के काम की नहीं होती, यही कारण है कि गोताखोर भी पानी में अपना ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर जाते हैं।

आज देश जिस तरह ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा है, उसके बीच हमें यह जानना आवश्यक है कि आखिर मेडिकल ऑक्सीजन बनती कैसे है?

हवा में 21% ऑक्सीजन 78% नाइट्रोजन, 1%अन्य गैस होती हैं। प्लांट में क्रायोजेनिक डिस्टिलेशन प्रक्रिया द्वारा ऑक्सीजन बनाई जाती है। हवा को एकत्र करने के बाद उसमें से धूल मिट्टी दूर करने के लिए फ़िल्टर किया जाता है। प्री फ़िल्टर, कार्बन फ़िल्टर, हेपा फ़िल्टर हवा को शुद्ध करते हैं। इसके बाद शुद्ध हवा को कम्प्रेस करने के बाद मॉलिक्यूलर छलनी से इस हवा को छाना जाता है, जिससे नाइट्रोजन, कार्बन और अन्य गैस उसमें से निकाला जाता है। 185 डिग्री सेल्सियस पर इस हवा को उबालकर ठंडा किया जाता है और तब लिक्विड एवम गैस दो प्रकार से ऑक्सीजन प्राप्त होती है।

अब कठिन प्रश्न यह उठता है कि जब बहुतायत में हवा से ऑक्सीजन निकालेंगे तो हवा में इसकी भरपाई कैसे होगी। क्योंकि जब ऑक्सीजन हवा से निकलेगी तो अन्य गैस का प्रतिशत हवा में बढ़ना शुरू होगा। ऐसे में इस धरती पर मौजूद सभी (मनुष्य, पशु, पक्षी आदि) को हवा से ऑक्सीजन लेना होगा और हवा से ऑक्सीजन निकालने में फेफड़ों को ज्यादा मेहनत करनी होगी।

सरकार और उसके अधिकारियों के द्वारा आज भी आने वाली इस समस्या की ओर ध्यान ना देकर बायपास को अपनाया जा रहा है।

वर्तमान में जो हालात हैं उसका एकमात्र हल मेडिकल ऑक्सीजन है, इस सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता पर भविष्य से आंख मूंद लेना मानव जाति के हित में नहीं है।

मैं सदा से कहता आया हूँ कि अनियोजित अंधाधुन्द विकास विनाश की ओर ले जाता है। आज उसी का परिणाम है कि ना हवा शुद्ध है और ना ही पानी। यह तो छोटी क्लास में पढ़ाया जाता है कि पेड़ हैं तो जीवन है और हमने विकास और प्रगति के नाम पर शहर से बचे खुचे पेड़ ही नहीं काटे बल्कि जंगलों का भी सफाया कर डाला। यह आसान सी बात हम कैसे भूल गए कि पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड लेकर हमें ऑक्सीजन का उत्सर्ग करते हैं।

अभी देर नहीं हुई है सरकार को चाहिए कि हाईवे के किनारे (इनके निर्माण के साथ ही) पीपल जैसे वृक्ष लगाना शुरू करे। इस धरती को हरा भरा कैसे करना है इस पर ध्यान होना चाहिए। वृक्षारोपण दिवस के नाम पर एक पौधे को 10 लोग पकड़ कर फोटो खिचायें पर उसके साथ इस बात की व्यवस्था भी करें कि वह पौधा सुरक्षित हो और पेड़ भी बन सके।

आंकड़ों के अनुसार देश में पेड़ से आच्छादित छेत्र 1991 में 21.67 प्रतिशत था जो अब 24% के आसपास है। परंतु, इनमें यह भी ध्यान रखने योग्य है कि भारी मात्रा में ऑक्सीजन देने वाले पेड़ की जगह सजावटी पेड़ शहरों में बहुत बढ़े हैं।

सरकार के साथ हम भी अपनी जिम्मेदारी समझें वरना हमारी पीठ पर जल्द एक ऑक्सीजन सिलिंडर होगा।