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‘जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान’

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिल राय ने कहा की भक्ति मनुष्यता की भावना को ध्यान में रखकर आगे बढ़ने की भावना का नाम है। भक्तों ने जिस सन्तोष भाव को केन्द्र में रखकर रचनायें कीं वह आज के समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। सन्तों की प्रसिद्ध घोषणा है “जब आवे सन्तोष धन, सब धन धूरि समान”।

हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के प्रथम सत्र में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भक्तों और सन्तों की बहुत बड़ी विशेषता जोड़ने की कला है और यह कला कबीर, तुलसी, सूर आदि में सर्वत्र बिखरी पड़ी है। उन्होंने कहा कि भारत के निर्माण में भक्ति कविता का महत्वपूर्ण योगदान है। “वसुधैव कुटुंबकम” की भावना हो और या फिर “सन्तन को कहा सीकरी सो काम” का उदघोष हो भक्ति कविता समाज निर्माण के दायित्त्वबोध के साथ आगे बढ़ती है।

व्याख्यानमाला के दूसरे सत्र में बोलते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर वशिष्ठ द्विवेदी ने कहा कि छन्द कविता की आत्मा है। हमारे भाव और विचार अपनी चरम अवस्था में स्वाभाविक रूप से गीतबद्ध हो जाते हैं। सामवेद से लेकर अब तक गीत की परम्परा अनवरत जारी है। विद्यापति, सूर, कबीर, तुलसी आदि सभी अपने गीतबोध के लिए स्मरणीय हैं। नवगीत आन्दोलन में भी यह गीतबोध प्रबल है। वर्तमान की नवगीत परम्परा समाज की सांस्कृतिक परम्पराओं के वहन का भी काम करती है। ग्रामीण संस्कृति के बोध को अगर कोई आन्दोलन आगे लेकर चला है तो वह नवगीत आन्दोलन ही है। यह आन्दोलन वैयक्तिक प्रेम, प्रकृति प्रेम और परम्परा प्रेम के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का भी आन्दोलन है।

विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कृपाशंकर पाण्डेय ने कहा की सांस्कृतिक अनुरक्षण के लिए नवगीत का सहारा लिया जाना चाहिए।

व्याख्यानमाला के संयोजक डॉ. राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि शंकरदेव जैसे सन्तों से लेकर सूर, कबीर, तुलसी और चैतन्य महाप्रभु जैसे सन्तों ने इस देश के निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया है। उनके दिखाये पथ का अनुसरण भी तमाम समस्याओं के निदान का एक मार्ग हो सकता है।

व्याख्यानमाला में देश के 20 राज्यों से कुल 422 नामांकन निवेदन प्राप्त हुए, जिनमें 126 प्राध्यापक, 100 शोधछात्र और 196 छात्र शामिल हैं। इनमें कुल 265 पुरुष और 157 महिलाएं शामिल हैं।

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